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Nirbhay Raj Mishra

Nirbhay Raj Mishra


जब जिन्दगी में कुछ समझ ना आया, जब आपको लगने लगे की जिन्दगी में सब व्यर्थ है 
तो समझ लेना की अब कुछ नया सीखने का वक्त आ गया है, और कुछ नया करने का वक्त है| 
 

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Nirbhay Raj Mishra

आए वो पल आपके

करीब मेरे मगर खुद के आस पास हो तुम लहकती बुझती हुई आग की उजास हो तुम | चहकते गाते परिंदे की ख़ामोशी हो तुम खिली सुबह की तरह – शाम की उदासी हो तुम | हजार चुप से घिरी हलचलों के   घेरे में रुकी रुकी सी हिचकती सी कोई सांस हो तुम | कभी निगाह की हद में कभी हद से बाहर हो कभी यकीन में ढलती कभी कयाश हो तुम | बने नही की टूट जाये एक बुत जैसे इतनी आम इतनी आम इतनी खास हो तुम | तेरी नींद की जरूरत मेरे ख्वाब का बहाना मेरा धीमे धीमे चलना तेरा हौले हौले आना | मासूम हसरतों क आये में पल रहा है तेरा लहर-सा मचलना मेरा तट-सा थरथराना | ये तुम्हारी मुस्कराहट अभी दिल में घुल रही है जरा देर यूं   ही रहना जरा थम के मुस्कराना | ये किसी की आरजू है, जो भटक रही है गुमसुम अभी बेखुदी में है, वो आवाज़ मत लगाना | कहीं धूप के उजाले कहीं शाम की स्याही कभी सुर्ख शोख सुबहें कभी शाम कातिलाना | आबाद होगी इनसे तनहाइयों की दुनिया ये गजल है, मुकम्मिल इसे त्तुम भी गुनगुनाना |