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Showing posts from December, 2017

Nirbhay Raj Mishra

Nirbhay Raj Mishra

Nirbhay Raj Mishra

मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा तुम्हारा फैसला था याद होगा बहुत से उजले उजले फूल लेकर कोई तुमसे मिला था याद होगा बिछी थी हर तरफ आँखें ही आँखें कोई आँसू गिरा था याद होगा उदासी और बढ़ती जा रही थी वो चेहरा बुझ रहा था याद होगा वो ख़त पागल हवा के आँचलों पर किसे तुमने लिखा था याद होगा 

Nirbhay Raj Mishra

दिल में एक लहर सी उठी है अभी कोई ताजा हवा चली है अभी शोर बरपा है खाना-ए-दिल में कोई दीवार सी गिरी है अभी कुछ तो नाजुक मिजाज़ हैं हम भी और ये चोट भी नयी है अभी भरी दुनिया में जी नही लगता जाने किस चीज की कमी है अभी तू शरीक-ए-सुखन नहीं है तो क्या हम-सुखन तेरी खामोशी है अभी याद के बे-निशां जंजीरों से तेरी आवाज़ आ रही है अभी शहर की बेचिराग गलियों में जिन्दगी तुझको ढूँढती है अभी वक्त अच्छा भी आएगा गम ना कर जिन्दगी पड़ी है अभी 

Nirbhay Raj Mishra

आँसुओं की जहाँ पायमाली रही ऐसी बस्ती चिरागों से खाली रही दुश्मनों की तरह उस से लड़ते रहे अपनी चाहत भी कितनी निराली रही जब कभी भी तुम्हारा ख्याल आ गया फिर कई रोज़ तक बेख्याली रही लब तरसते रहे इक हंसी के लिए मेरी कश्ती मुसाफिर से खाली रही चाँद तारे सभी हम-सफ़र थे मगर जिन्दगी रात थी रात काली रही मेरे सीने पे खुश्बू ने सर रख दिया मेरी बाँहों में फूलों की डाली रही 

Nirbhay Raj Mishra